सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

आत्मज्ञान क्या है।

  मन ही संसार है - और मन ही मोक्ष*
















मन से ही यह सारा संसार उत्पन्न हुआ है। इसलिए हर जीव को यह संसार अलग-अलग दिखाई देता है। 


एक मनुष्य के लिए संसार उसकी इच्छाओं, उसके सपनों और उसके डर के अनुसार है। वही एक पशु के लिए संसार केवल भूख, नींद और भय के अनुसार है। संसार एक ही है, पर सबके मन अलग-अलग हैं, इसलिए सबका संसार भी अलग-अलग है। यह बात समझ लेना ही आधी मुक्ति है।


*जब मन ही सब कुछ बन जाता है*


जब व्यक्ति अपने मन के द्वारा बनाये हुए इस संसार को ही 100% सत्य मान लेता है, तभी सारी समस्या शुरू होती है। उसे लगता है कि यही घर, यही पैसा, यही रिश्ता, यही इज्जत ही सब कुछ है।


ऐसा मानते ही उसकी वासनाएं, उसकी इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं। एक इच्छा पूरी होती है तो मन दूसरी इच्छा खड़ी कर देता है। मन उसे कहता है - "अब ये मिल जाए तो सुखी हो जाऊंगा।" वो वस्तु मिल भी जाती है, पर सुख दो दिन में खत्म हो जाता है। फिर मन किसी और वस्तु के पीछे दौड़ा देता है।


इसी उलझन में वह सारे कर्म अहंकारवश करता है। उसे लगता है "मैं कर रहा हूँ, मेरे कारण हो रहा है।" इसी अहंकार के कारण वह कर्मों में लिप्त हो जाता है।


यदि वह बुरे कर्म करता है तो उसे बुरे फल भोगने पड़ते हैं। यदि वह अच्छे कर्म भी करता है तो अच्छे फलों को भोगता है, जैसे स्वर्ग की प्राप्ति। पर क्योंकि हर कर्म के पीछे "मैं" खड़ा है, इसलिए वह पुण्य और पाप दोनों के चक्कर में जन्म और मृत्यु के जाल में फंसा रहता है। वह कभी स्वर्ग और कभी नरक की यात्रा में ही लगा रहता है, मुक्त कभी नहीं होता।


जिसने इस माया के संसार को ही अंतिम सत्य समझ लिया, वह मन की अहं-बुद्धि का शिकार हो गया। वह परमात्मा से, अपने असली स्वरूप से सदा दूर ही रहता है, ठीक वैसे जैसे हिरण अपनी ही नाभि की कस्तूरी की खुशबू को बाहर जंगल में ढूंढता फिरता है।


*मन पर नियंत्रण ही आत्मज्ञान है*












लेकिन जब व्यक्ति अपने मन को देखना शुरू करता है, उसे पूरी तरह से नियंत्रित करता है, उसे अपना मालिक नहीं बल्कि एक औजार समझता है, तभी उसके जीवन में एक चमत्कार होता है।


देर-सवेर उसके भीतर आत्मज्ञान का दिया जलने लगता है। तब उसे यह सारा फैला हुआ संसार रेगिस्तान में दिखने वाली मृगतृष्णा की तरह झूठा लगने लगता है। दूर से पानी जैसा दिखता है, पास जाओ तो कुछ नहीं। ठीक वैसे ही संसार की हर वस्तु दूर से सुख देने वाली लगती है, पर पास जाकर सब खाली है।


साधारण मनुष्य की दृष्टि उस ओर जाती ही नहीं जहाँ से उसे आत्मज्ञान मिल सकता है। वह तो सदा राग और द्वेष, यानी पसंद और नापसंद, और इंद्रियों के दोषों में ही उलझा रहता है। वह जीवन भर मन की ही गुलामी करता रहता है।


वह मन के सुख-दुखों को ही अपना सुख-दुख मान लेता है और उसी में लिप्त रहता है। उसका जीवन परमात्मा की प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि संसार की माया में किसी ऐसी चीज़ के पीछे भागने में बीत जाता है, जिसके बारे में उसे लगता है कि इसे पाकर वह सुखी हो जाएगा। उसे पा लेने पर भी वह भीतर से खाली ही रहता है।


निश्चय ही परमात्मा के बिना यह जीवन पंगु के समान है, जिसमें सब कुछ मिलकर भी कुछ नहीं मिलता।


*अंतिम सत्य*


और जिस दिन साधक यह जान लेता है कि यह परमात्मा ही मेरे द्वारा स्वयं अपने ही माये के संसार का अनुभव कर रहा है, उसी दिन खेल खत्म हो जाता है। 


वास्तव में आज तक कुछ हुआ ही नहीं है। न कोई जन्मा है, न कोई मरा है। यह सारा जड़-चेतन जगत, यह पेड़, पौधे, मनुष्य, पशु, सब उसी एक परमात्मा के ही अनंत रूप हैं। वह एक होकर ही अनंत रूपों में स्थित है।


दृश्य जगत कभी बना ही नहीं, सदा से केवल परमात्मा ही सत्य है। यह जानकर वह व्यक्ति जीव नहीं रह जाता, वह अपने असली स्वरूप परब्रह्म परमात्मा में ही एक हो जाता है। तब उसका संसार पूरी तरह निवृत्त हो जाता है और हर तरफ, हर कण में केवल परमात्मा ही दिखलाई पड़ता है।


इसी का



नाम आत्मज्ञान है, इसी का नाम मोक्ष है और यही परमपद है।


---

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मन से मुक्ति

.Title: मन क्या है? मन ही संसार है | अवधूत गीता से मुक्ति का पहला कदम* *ॐ दत्तात्रेय नमः* *हमारा जीवन व्यर्थ क्यों जा रहा है?* आज हर व्यक्ति एक ही सवाल से परेशान है - शांति क्यों नहीं मिल रही? हम सुबह से शाम तक मेहनत करते हैं, पैसे कमाते हैं, परिवार के लिए सब कुछ करते हैं, फिर भी रात को नींद नहीं आती। इसका कारण बाहर नहीं, अंदर है। हमारा पूरा जीवन मन की गुलामी करने में बीत जाता है। मन जो कहता है, हम वही करते हैं। लेकिन हम कभी भी इस मन से मुक्त नहीं हो पाते। इसी वजह से हम दुखों में गिर जाते हैं और हमारा सारा जीवन व्यर्थ हो जाता है। जन्म और मरण का चक्कर इसी वजह से चलता रहता है। इस मन से मुक्ति कैसे पाएं, यही इस ब्लॉग का मुख्य उद्देश्य है। *मन की परिभाषा क्या है?* हमारे शास्त्रों, खास तौर पर अवधूत गीता और अष्टावक्र गीता में साफ लिखा है - *मन ही संसार है।* मन कोई वस्तु नहीं है। मन विचारों का एक प्रवाह है। जैसे नदी में पानी बहता रहता है, वैसे ही मन में विचार बहते रहते हैं। जिसका मन कंट्रोल में नहीं है, वो इस दिखने वाले संसार को ही सत्य समझ लेता है। उसे लगता है कि ये घर, ये गाड़ी, ये रिश्तेदा...

मन से मुक्ति पार्ट 2

टाइटल:* जीवन का सबसे बड़ा भ्रम क्या है? मन ही संसार का बीज है *लेबल:* मन की माया, जीवन का सत्य, अद्वैत *आर्टिकल:* जीवन का भ्रम क्या है? हम सब एक बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं। हमें लगता है कि मन द्वारा रचित ये संसार ही सत्य है। हम जो आँखों से देखते हैं, कानों से सुनते हैं, उसी को सच मान लेते हैं। लेकिन शास्त्रों में कहा गया है कि इस संसार के पीछे जो विराट परमात्मा है, वो मन की आँखों से कभी नहीं देखा जा सकता। उस परमात्मा को देखने के लिए मन का मिट जाना बहुत जरूरी है। मन संसार का बीज कैसे है? किसी भी पेड़ को देखिए। वो एक छोटे से बीज से बनता है। बीज दिखता नहीं, लेकिन उसी में पूरा पेड़ छुपा होता है। ठीक वैसे ही, मन ही इस संसार का मूल बीज है। मन दिखाई नहीं देता, लेकिन इसी से ये पूरा दिखने वाला संसार बनता है। इसीलिए शास्त्रों में लिखा है - *मन ही संसार है।* इसलिए ज्ञानियों ने कहा है, मन का गुलाम मत बनो, बल्कि मन को अपना गुलाम बनाओ। जो मन का गुलाम है, वो दुखी है। जो मन का मालिक है, वो सुखी है। मन की अपार शक्ति मन के पास अपार शक्ति है। ये एक ही चीज को अनेक प्रकार से दिखाता है। ये भेद करता है। ए...

मन से मुक्ति पार्ट 4

 *दो पक्षियों की कथा - जीव से शिव तक की यात्रा* जीवन को एक अज्ञानी की तरह जीने वाले हम मनुष्य इस जीवन में सब कुछ करते हैं, धन कमाते हैं, रिश्ते बनाते हैं, मान-सम्मान के पीछे भागते हैं, लेकिन कभी हमारा ध्यान उस ईश्वरीय ताकत को प्राप्त करने में नहीं जाता जो हमारे होने का कारण है और इस जगत का भी। जिसने हमें ये सारी व्यवस्था, ये शरीर, ये श्वास, ये बुद्धि करके दी है, हम उसे इस तरह नकारते हैं जैसे वो है ही नहीं।  हमारे मन ने हमें संसार में बांध कर रखा हुआ है। वो परमात्मा चाहे भी तो हमें आज़ादी नहीं दे पाता, क्योंकि हम खुद ही आज़ाद होना नहीं चाहते। हम बंधन को ही सुख मान बैठे हैं। जो परमात्मा हमें सबसे पहले याद आना चाहिए, वो हमसे भूला जा चुका है। मनुष्य के मन में संसार की वासना भरी है, उसको परमात्मा की तरफ जाना नहीं आता। मन अनेक भोग भोगने पर भी कभी तृप्त नहीं होता। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी जन्म लेती है। फिर वो क्या है जिसे प्राप्त करने पर मन कभी दुःख में नहीं होता? हमारी ही तरह शरीर वाले वे कौन लोग थे जिन्हें इच्छित वस्तु प्राप्त न होने पर भी उनका मन कभी दुःख में नहीं आता था? वो कौ...